***छत्तीसगढ़ की भू - वैज्ञानिक संरचना***
छत्तीसगढ़ पृथ्वी के प्राचीन भूखण्ड गोण्डवाना लैण्ड का एक हिस्सा है। यहां की भू - गार्भिक संरचना अत्यधिक विविधतापूर्ण हैं।
शैलो के वितरण के आधार पर प्रदेश को लगभग निम्न भागों में बांटा गया है :-
1. आद्य महाकल्प या आर्कियन शैल समूह
2. धारवाड़ शैल समूह
3. कड़प्पा शैल समूह
4. विन्ध्यन शैल समूह
5. प्री - कैम्ब्रियन शैल समूह
6. गोण्डवाना शैल समूह
7. दक्कन ट्रैप शैल समूह
8. लैटेराइट शैल समूह
9. एल्यूवियम शैल समूह ( जलोढ़ शैल )
शैलो का वितरण निम्न प्रकार है :-
*** १. आद्य महाकल्प या आर्कियन*****
* आर्कियन चट्टाने प्राचीन तथा कठोर होती है। ये चट्टानें मुख्यतः लावा के ठण्डे होने से निर्मित जीवाश्म रहित चट्टानें हैं।
* आर्कियन शैल समूह में ग्रेनाइट , नीस , माइका आदि पाई जाती है।
* छत्तीसगढ़ में इसका विस्तार बघेलखण्ड के पठार , जशपुर - सामरीपाट , राजगढ़ बेसिन तथा दंडकारण्य में है।
* लगभग सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का 50 % भाग आर्कियन चट्टानों से बना हुआ है। इसलिए यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा शैल समूह है।
* यह शैल समूह गहरे स्थानों पर पाया जाता है।
****** २. धारवाड़ शैल समूह *****
* यह जलीय अवसादी चट्टानें है , जिसका निर्माण आर्कियन चट्टानों के अपरदन से हुआ है। इनमे जीवाश्म नहीं होता है।
* इस समूह में टीन तथा लौह अयस्क पाया जाता है।
* धारवाड़ शैल समूह राज्य के मैदानी भू - भाग ,कसडोल ,पण्डरिया , कबीरधाम तहसीलों में तथा दंडकारण्य के मोहेला (दक्षिण भाग ) , भानुप्रतापपुर , जगदलपुर और दंतेवाड़ा तहसीलों में पाए जाते है।
* इस शैल समूह में मुख्यतः तीन सीरीज पाई जाती है :-
* चिल्फी घाटी सीरीज -इसका विस्तार बिलासपुर जिले के शिस्त शैल क्षेत्र के उत्तर -पूर्व में दक्षिण -पश्चिमी दिशा में है। यह सीरीज रतनपुर के उत्तर -पूर्व से प्रारम्भ होकर मैकाल के पश्चिम तक व्यवस्थित रूप में मिलती है
* सोनाखान सीरीज -धारवाड़ समूह के बाहर वाले छोटे भागो को एफ एच स्मिथ ने सोनाखान सीरीज नाम दिया था।
* दण्डकारण्य प्रदेश की लौह -अयस्क सीरीज -इसका विस्तार दुर्ग जिले में संजारी बालोद तहसील के दक्षिणी भाग में छोटी पहाड़ी के रूप में है।
****** ३. कड़प्पा शैल समूह *****
* इस शैल समूह का निर्माण ग्रेनाइट चट्टानों के अपरदन से हुआ है।
* यह शैल समूह छत्तीसगढ़ राज्य का दूसरा सबसे बड़ा समूह (25 -30 %) है।
* इस शैल समूह की आकृति पंखाकार है , जिसके कारण छत्तीसगढ़ के मैदान का निर्माण हुआ है।
* इस शैल समूह में चूना पत्थर एवं डोलोमाइट पाया जाता है।
* इस शैल समूह का सर्वाधिक विस्तार जगदलपुर , महासमुंद , भोपालपट्टनम , सरायपाली , नवागढ़ , धमधा , दुर्ग , गुंडरदेही पाटन , जांजगीर -चांपा ,बिल्दा , बिलासपुर , बलौदबाज़ार , तिल्दा , कसडोल , बिलाईगढ़ आदि में हुआ है।
इस शैल समूह में मुख्यतः दो सीरीज पाई जाती है :-
* रायपुर सीरीज - यह दुर्ग , रायपुर एवं बिलासपुर तक विस्तृत है।
* चंद्रपुर सीरीज - यह फिंगेश्वर , महासमुंद , होटाड , धानसिर , मधुवन होते हुए रायपुर जिले के दक्षिण भाग में रायगढ़ तक विस्तृत है।
******* ४. विंध्यन शैल समूह *****
* इस शैल समूह का निर्माण कड़प्पा काल के बाद हुआ है। इसका विस्तार क्षेत्र इंद्रावती संघ का जगदलपुर समूह और रायपुर संघ का रायपुर , बालोद है। इस शैल समूह की चट्टानें जलज चट्टानें है, जो नर्मदा बेसिन में पाई जाती है।
****** ५. प्री - कैम्ब्रियन शैल समूह *****
* इस शैल समूह का निर्माण ज्वालामुखी उद्भेदन से हुआ है। इसका विस्तार राजनांदगांव , दुर्ग तथा बालोद जिले में है।
***** ६. गोण्डवाना शैल समूह *****
* इस शैल समूह का निर्माण नदियों के अवसादों तथा वनस्पति एवं जीवो के अवशेषों द्वारा हुआ है।
* राज्य के लगभग 17 % भाग में गोण्डवाना शैल समूह का विस्तार पाया जाता है।
* छत्तीसगढ़ में गोण्डवाना शैल समूह का सर्वोत्तम अध्ययन 1872 ई. में मेडलीकाण्ड ने किया तथा इन्हे गोण्डवाना शैल समूह नाम दिया था।
* इस शैल समूह में कोयला , लौह अयस्क एवं जीवाश्म पाया जाता है।
* यह शैल समूह दक्षिण -पूर्व की ओर स्थित महानदी घाटी का अनुगमन करता हुआ विस्तृत है। यह रायगढ़ के मध्य भाग में तथा बिलासपुर के उत्तर -पूर्वी भाग तक विस्तृत है।
इस शैल समूह की तीन सीरीज निम्न है :-
* ऊपरी गोण्डवाना - यह बघेलखण्ड के जशपुर , मनेंद्रगढ़ , प्रतापपुर , बैकुंठपुर , सूरजपुर आदि तहसीलों में विस्तृत है। इस शैल क्रम में कोयले की मोटी परत है।
* मध्य गोण्डवाना - यह महानदी घाटी में विस्तृत है। इसे परसोरा तथा टिकी नाम से जाना जाता है। इसका विकास प्रायः छत्तीसगढ़ में नहीं हुआ है। इसमें जीवाश्म पाया जाता है।
* निचला गोण्डवाना -यह शैल समूह मनेन्द्रगढ़ , बैकुंठपुर , सरगुजा , अंबिकापुर , कटघोरा , कोरबा , खरसिया , धरमजयगढ़ तथा रायगढ़ तहसीलों में विस्तृत है। यह कोयला तथा बालू पत्थर से निर्मित है।
***** ७. दक्कन ट्रैप शैल समूह ****
* इस शैल समूह का निर्माण दरारी ज्वालामुखी से निकले हुए बेसाल्ट युक्त लावा से हुआ है।
* यह मैकाल श्रेणी के पूर्व भाग कवर्धा , राजनांदगांव जिले में तथा जशपुर -सामरीपाट प्रदेश में विस्तृत है।
* बेसाल्ट चट्टानों के अपरदन से काली मिट्टी का निर्माण होता है। इसमें मुख्य रूप से बाक्साइड खनिज पाया जाता है।
******८. लैटेराइट शैल समूह *****
* इस शैल समूह का निर्माण दक्कन ट्रैप के क्षरण से हुआ है।
* इसका विस्तार रायपुर (आर्कियन शिस्ट ) ,दुर्ग (धारवाड़ शिस्ट ) ,तलचीर की क्ले , रायगढ़ व बिलासपुर में हिमगिरि शैल और बिलासपुर व दुर्ग में दक्कन ट्रैप के ऊपर पाया जाता है।
* इसमें मैगनीज व बाक्साइड जैसे खनिज पाए जाते है। इसमें फसल उत्पादकता बहुत कम होती है।
***** ९. एल्यूवियम शैल समूह (जलोढ़ )******
* एल्यूवियम शैल नदी घाटियों तथा नालो के तटों पर पाई जाती है। इसे कछार भी कहते है। सरगुजा एवं जशपुर जिले के कुछ भाग में इसका विस्तार है।
* जलोढ़ मैदान का विस्तार राज्य में बहुत कम पाया जाता है।
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